गुरुवार, 9 फ़रवरी 2012

जहाँ सब हैं उसमें होकर भी मुक्त होना जीने की कला है ...








मौसम के बदलाव में कुछ अस्वस्थ रहा तो अनुपस्थित रहा . सूत्रधार हूँ = पर इन्सान ही हूँ , तो क्षमा का हकदार भी हूँ . आज मस्तिष्क में एक हलचल सी हुई और कई नाम कई चेहरे मुझे पुकारने लगे - सबसे पहला चेहरा जो बिजली की तरह प्रस्फुटित हुआ उनका नाम है सुमन सिन्हा . रीजेंट थियेटर , आर्ट ऑफ़ लिविंग , परिकल्पना , वटवृक्ष , परिक्रमा काव्य-संग्रह . इनको भी देखा था मैंने सम्मान के मंच पर = इनके ब्लॉग  Main hoon... से आप सब लगभग परिचित होंगे . आपने भी पढ़ा होगा इनका लिखा , = ये जीवन की कला सिखाते हैं ! शिक्षक वही होता है , जिसने सीख लिया हो . सिखाता वही है , जिसने जान लिया हो = पर मैंने विरोधाभास देखा है . कहीं ये आम इन्सान से दिखते हैं , कहीं खुद में उलझे , कहीं ईश कहीं प्रश्न !

इनकी एक रचना आत्म - केन्द्रित   मेरे हर नज़रिए का पुष्टिकरण करेगी . विस्तार में भी संकुचन , सत्य में असत्य . जहाँ सब हैं उसमें होकर भी मुक्त होना जीने की कला है , अन्यथा भटकाव है . 

13 टिप्‍पणियां:

  1. भटकाव ही आधार है सत्य को पाने का ... अपना अपना नजरिया है !

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  2. जहाँ सब हैं उसमें होकर भी मुक्त होना जीने की कला है ...

    उत्कृष्ट लेखन..सुमन जी से परिचय तो हुआ ही...
    शुक्रिया..

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  3. sunder prastuti ke saath aapne accha parichay diya hai suman ji ka .......SADAR

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  4. भटकाव होता है तो कुछ खोजने की इच्छा और संभावना होती है ...

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  5. परिचय की इस कड़ी में जाना ... ये जीवन की कला सिखाते हैं ! शिक्षक वही होता है , जिसने सीख लिया हो . सिखाता वही है , जिसने जान लिया हो ... आपके यह गहनता लिए विचार सार्थकता भरे हैं .. प्रस्‍तुति के लिए आपका आभार ...

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  6. suman jee ka vyaktitwa ham dekh chuke hain...!! ek prabhavshali vyaktitwa aur us se bhi prabhavshali rachna...:))

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  7. सुमन जी का ब्लॉग पढ़तीं रहती हूँ ..यहाँ आज, सूत्रधार जी ,आपके द्वारा दिया गया परिचय बहुत बढ़िया रहा ....बधाई एवं शुभकामनायें.....

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  8. संक्षिप्त और सुन्दर प्रस्तुति .

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सूत्रधार आप सभी के विचारों का स्‍वागत करता है ...